निष्पादन

आर्थिक संकेतक

उत्पादन
रोज़गार
निर्यात
अवसर


उत्पादन

देश के विकास में लघु उद्योग क्षेत्र की एक बड़ी भूमिका है। भारतीय अर्थव्यवस्था में इसका योगदान औद्योगिक मूल्य संवर्धन का लगभग 40 प्रतिशत है।

यह अनुमान है कि लघु उद्योग क्षेत्र में निश्चित संपत्तियों में एक मिलियन रुपये का निवेश लगभग दस प्रतिशत अंकों के मूल्य संवर्धन के साथ 4.62 मिलियन मूल्य की वस्तुओं अथवा सेवाओं का उत्पादन करता है।

पिछले वर्षों में लघु उद्योग क्षेत्र का तेजी से विकास हुआ है। विभिन्न योजनावधियों के दौरान वृद्धि दर काफी प्रभावशाली रही है। लघु उद्योग इकाइयों की संख्या वर्ष 1980-81 में अनुमानित 0.87 मिलियन की तुलना में वर्ष 2000 में बढ़कर 3 मिलियन हो गई है।

जब इस क्षेत्र के निष्पादन को संपूर्ण निर्माण और औद्योगिक क्षेत्र की वृद्धि की तुलना में देखा जाता है तो लघु उद्योग क्षेत्र के लचीलेपन में विश्वास जमता है।

वर्ष

लक्ष्य

उपलब्धि

1991-92

3.0

3.1

1992-93

5.0

5.6

1993-94

7.0

7.1

1994-95

9.1

10.1

1995-96

9.1

11.4

1996-97

9.1

11.3

1997-98

*

8.43

1998-99

*

7.7

1999-00

*

8.16

2000-01 (P)

*

8.90






P-प्रक्षेपित (अप्रैल-दिसंबर)

*लक्ष्य स्थिर मूल्यों पर निर्धारित नहीं


रोज़गार

भारत में लघु उद्योग क्षेत्र कृषि के बाद भारतीय जनसंख्या के लिए सर्वाधिक रोज़गार अवसर सृजन करता है। यह अनुमान है कि लघु उद्योग क्षेत्र में निश्चित सम्पदाओं में निवेशित 100,000 रुपये चार लोगों के लिए रोज़गार सृजित करते हैं।

रोज़गार सृजन - समूहवार उद्योग

रोज़गार सृजन में खाद्य उत्पाद उद्योग का प्रथम स्थान है जो 0.48 मिलियन (13.1 प्रतिशत) लोगों को रोज़गार देता है। अगले दो उद्योग समूह हैं गैर-धात्विक खनिज उत्पाद जो 0.45 मिलियन (12.2 प्रतिशत) और धातु उत्पाद जो 0.37 मिलियन (10.2 प्रतिशत) लोगों को रोज़गार देते हैं।

रसायनों और रसायन उत्पादों, इलेक्ट्रिकल पार्ट्स को छोड़कर मशीनरी पार्ट्स, काष्ठ उत्पादों, आधारभूत धातु उद्योग, कागज़ उत्पादों और छपाई, हौज़री व सिलेसिलाए वस्त्र, मरम्मत सेवाओं तथा रबड़ व प्लास्टिक उत्पादों का योगदान 9 प्रतिशत से 5 प्रतिशत के बीच है जबकि इन आठ उद्योग समूहों का कुल योगदान 49 प्रतिशत है।

अन्य सभी उद्योगों का योगदान 5 प्रतिशत से कम है।

प्रति इकाई रोज़गार

प्रति इकाई रोज़गार उन इकाइयों में सर्वाधिक (20) था जो पेय पदार्थों, तम्बाकू और तम्बाकू उत्पादों में संलग्न थीं। विशेष रूप से महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, असम और तमिलनाडु में इसका मुख्य कारण इस उद्योग में उच्च रोज़गार की संभावनाएं थीं।

इसके बाद सूती वस्त्र उत्पाद (17), गैर-धात्विक खनिज उत्पाद (14.1), मूल धातु उद्योग (13.6) और इलैक्ट्रिकल मशीनरी व उसके भाग (11.2) आते हैं। निम्नतम संख्या 2.4 मरम्मत सेवा क्षेत्र में है।

प्रति इकाई रोज़गार महानगरीय क्षेत्रों में सर्वोच्च (10) तथा ग्रामीण क्षेत्रों में निम्नतम (5) थी।

तथापि, रसायन और रसायन उत्पादों, गैर-धात्विक उत्पादों और मूल धातु उद्योगों में प्रति इकाई रोज़गार की दर महानगरीय क्षेत्रों/शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में उच्चतर थी।

शहरी क्षेत्रों में पेय पदार्थों, तम्बाकू उत्पादों (31 व्यक्ति ), सूती वस्त्र उत्पादों (18), मूल धातु उद्योगों (13) और गैर-धात्विक खनिज उत्पादों (12) में प्रति इकाई सर्वाधिक रोज़गार था।

स्थान के अनुसार रोज़गार संवितरण - ग्रामीण

गैर-धात्विक उत्पादों का ग्रामीण क्षेत्रों में सृजित रोज़गार में 22.7 प्रतिशत योगदान रहा। खाद्य उत्पाद 21.1 प्रतिशत, काष्ठ उत्पाद और रसायन व रसायन उत्पाद 17.5 प्रतिशत पर आंके गए हैं।

शहरी

शहरी क्षेत्रों के लिए, खाद्य उत्पादों और धातु उत्पादों की हिस्सेदारी लगभग समान 22.8 प्रतिशत है। इलैक्ट्रीकल को छोड़कर मशीनरी पार्ट्स, गैर-धात्विक खनिज उत्पाद और रसायन व रसायन उत्पाद रोज़गार का परस्पर 26.2 प्रतिशत हैं।

महानगरीय क्षेत्रों में धातु उत्पाद, इलैक्ट्रीकल को छोड़कर मशीनरी और पार्ट्स तथा कागज़ उत्पाद और छपाई (कुल भाग 33.6 प्रतिशत) अग्रणी उद्योग थे।

राज्यवार रोज़गार संवितरण

तमिलनाडु (14.5 प्रति शत) ने रोज़गार में सर्वाधिक योगदान किया है।

इसके बाद महाराष्ट्र (9.7 प्रतिशत) , उत्तर प्रदेश (9.5 प्रतिशत) और पश्चिम बंगाल (8.5 प्रतिशत) हैं जिनका कुल हिस्सा 27.7 प्रतिशत है।

गुजरात (7.6 प्रतिशत) , आंध्र प्रदेश (7.5 प्रतिशत) , कर्नाटक (6.7 प्रतिशत) और पंजाब (5.6 प्रतिशत) मिलकर 27.4 प्रतिशत हैं।

प्रति इकाई रोज़गार नागालैंड, सिक्किम और दादरा व नगर हवेली में क्रमश: 17, 16 और 14 उच्च था।

यह महाराष्ट्र, त्रिपुरा और दिल्ली में 12 था।

मध्य प्रदेश में निम्नतम संख्या 2 थी। अन्य सभी मामलों में यह 6 की औसत के आसपास था।

वर्ष

लक्ष्य
(संख्या लाख में)

उपलब्धि
(संख्या लाख में)

वृद्धि दर

1992-93

128.0

134.06

3.28

1993-94

133.0

139.38

3.28

1994-95

138.6

146.56

5.15

1995-96

144.4

152.61

4.13

1996-97

150.5

160.00

4.88

1997-98

165

167.20

4.50

1998-99

170.1

171.58

2.61

1999-00

175.4

177.3

3.33






P-अनंतिम


निर्यात

भारत के वर्तमान निर्यात निष्पादन में लघु उद्योग क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका है। भारतीय निर्यात में 45-50 प्रतिशत भाग लघु उद्योग क्षेत्र का है। लघु उद्योग क्षेत्र से प्रत्यक्ष निर्यात कुल निर्यात का लगभग 35 प्रतिशत है। प्रत्यक्ष निर्यात के अतिरिक्त, यह अनुमान है कि लघु उद्योग इकाइयां अप्रत्यक्ष निर्यात में भी लगभग 15 प्रतिशत हिस्सा बंटाती हैं। यह कार्य मर्चेंट निर्यातकों, व्यापार घरानों और निर्यात घरानों के माध्यम से होता है। वे बड़ी इकाइयों से निर्यात आदेशों के रूप में अथवा तैयार निर्यात योग्य माल के लिए प्रयोग हेतु हिस्सों और पुर्जों के उत्पादन के रूप में भी हो सकते हैं।

कई लोगों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि लघु उद्योग क्षेत्र के निर्यातों में गैर-परंपरागत उत्पादों का हिस्सा 95 प्रतिशत से अधिक है।

इस दशक में लघु उद्योग क्षेत्र से निर्यात की वृद्धि दर अति उत्तम रही है। इसमें इस क्षेत्र की वस्त्र, चमड़ा और जवाहरात व आभूषण इकाइयों के निष्पादन का प्रमुख योगदान रहा है।

उत्पाद समूह जहां लघु उद्योग क्षेत्र का निर्यातों में दबदबा है, वे हैं खेलों के सामान, सिलेसिलाए वस्त्र, ऊनी और बुने हुए वस्त्र, प्लास्टिक उत्पाद, संसाधित खाद्य पदार्थ तथा चर्म उत्पाद।

लघु उद्योग क्षेत्र विश्व व्यापार संगठन द्वारा प्रारंभ की गई नयी व्यापार व्यवस्था के अनुसार अपनी निर्यात रणनीति का पुनर्भिमुखीकरण कर रहा है।

वर्ष

निर्यात
(करोड़ रुपये में)
(वर्तमान मूल्यों पर)

1994-95

29,068
(14.86)

1995-96

36,470
(25.50)

1996-97

39,249
(7.61)

1997-98

43946
(11.97)

1998-99

48979
(10.2)

1999-00 (P)

53975
(10.2)


P-अनंतिम



अवसर

निम्नलिखित कारणों से लघु उद्योग क्षेत्र में विशाल अवसर हैं :

  • कम पूंजी की आवश्यकता
  • सरकार द्वारा विस्तृत संवर्धन और समर्थन
  • लघु उद्योग क्षेत्र द्वारा विशिष्ट निर्माण के लिए आरक्षण
  • परियोजना प्रोफाइल
  • धन - वित्त और सब्सिडी
  • मशीनरी प्राप्ति
  • कच्चे माल की प्राप्ति
  • मानव-शक्ति प्रशिक्षण
  • तकनीकी और प्रबंधकीय कौशल
  • औजार तथा परीक्षण सहयोग
  • सरकार द्वारा विशिष्ट क्रय के लिए आरक्षण
  • निर्यात संवर्धन
  • सकल आर्थिक वृद्धि के कारण घरेलू बाजार आकार में मांग में वृद्धि
  • भारतीय उत्पादों के लिए बढ़ते हुए भावी निर्यात
  • वृहत्त क्षेत्र में हरित इकाइयों की बढ़ती संख्या के कारण अनुषंगी इकाइयों की आवश्यकता में वृद्धि। लघु उद्योग क्षेत्र ने बहुत बढ़िया प्रदर्शन किया है और अपने देश को औद्योगिक वृद्धि तथा विविधता के बड़े परिमाण प्राप्त करने में समर्थ बनाया है।

कम पूंजी लगने और उच्च श्रमिक समावेशन प्रकृति के द्वारा लघु उद्योग क्षेत्र ने रोज़गार सृजन और ग्रामीण औद्योगिकीकरण में उल्लेखनीय योगदान किया है। प्रौद्योगिकी के सम्मिलन, पूंजी और अभिनव विपणन व्यवहार द्वारा अपने परंपरागत कौशल और ज्ञान को सुदृढ़ करने के लिए यह एक आदर्श क्षेत्र है। लघु उद्योग क्षेत्र में परियोजनाएं स्थापित करने के लिए यह सुअवसर है। यह कहा जा सकता है कि यदि कुछ सुरक्षा उपाय रखे जाएं तो स्थिति सकारात्मक ही नहीं वरन् आशाजनक है। यह अपेक्षा भारतीय उद्योग और मांग ढांचे की आवश्यक विशेषता पर आधारित है। उत्पादन प्रणाली और मांग ढांचे में विविधता उपभोक्ता उत्पादों/प्रौद्यागिकियों/संसाधनों के लिए मांग के अनेक स्तरों के दीर्घावधि सह-अस्तित्व को सुनिश्चित करेगी। वहां गुणवत्ता, मूल्य संवर्धन और कृत्रिमता द्वारा भिन्न किए गए समान उत्पाद/संसाधन के लिए समृद्ध तथा सुस्थापित बाजार हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था की यह विशेषता इकाइयों के विभिन्न विविध प्रकारों के लिए सम्मानित उपस्थिति की अनुमति देती है। सरकार की संवर्धक और सुरक्षात्मक नीतियों ने उत्पादों विशेषकर उपभोक्ता सामानों की एक आश्चर्यजनक श्रृंखला में इस क्षेत्र की उपस्थिति सुनिश्चित की है। यद्यपि पूंजी, प्रौद्योगिकी और विपणन की कमियां इस क्षेत्र में बड़ी बाधाएं बनी रही हैं। फिर भी, सरकारी समर्थन के साथ उदारीकरण की प्रक्रिया इस क्षेत्र में मात्र इन वस्तुओं के निषेचन को आकर्षित करेगी।